मंदिर के बारे में

।। श्री जानकीवल्लभौ विजयते।।

DSC_8296 - compressedभक्त शिरोमणि, सूरवीरों, विरांगनाओं, ईश भक्तों, रण बांकुरो की मातृभूमि जेा हर क्षण प्राण  न्यौछावर करने वाले, अपनी आन-बान के लिए शीश न झुकाने वाले, मृदुभाषी, धर्मप्रेमी, निष्ठावान व्यापार में पांरगत समस्त विश्व में डंका बजाने वालो की पावन मरूधर भूमि सदैव भारत के इतिहास में चर्चित रही है।

इस वन्दनीय शश्यश्यामला पर समय समय पर तपस्वी आत्माऐं एवं जगत उद्वारक, धर्मरक्षा एवं जनजागरण चेतना जगाने, विभिन्न स्थानों पर देवालय एवं लोक कल्याण कार्य पूर्ण करने हेतु पुण्य आत्माऐं स्वंय ही अवतारित हुई या उन्हें यह धरा स्वतः आकर्षित कर लेती है।

इसी कड़ी में ऐसी ही पावन धरा जो राजस्थान प्रान्त के पाली जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 162 ब्यावर से पाली मार्ग, बांसिया-मोहरा कलां गांव के बीच स्थित  है जो ‘‘श्री सीताराम सेवा आश्रम’’ मोहरा  कलां  से विख्यात है। आश्रम अपनी वास्तुकला, भव्यता एवं चमत्कारों, प्राणीमात्र की सेवा, धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अल्प समय में क्षैत्र ही नही भारत में अपनी प्रसिद्वि पाकर निर्वाद आस्था का केन्द्र बन चूका है।

वर्तमान में जिस भूखण्ड़ पर आश्रम स्थित है वह श्रेत्र प्रेतआत्माओं की उपस्थिति के लिए प्रसिद्व था। भरी दुपहरी में भी लोंगों के साथ कई अनजानी घटनाऐं घट चुकी थी, इस कारण लोग जाने से भय खाते थे। बांसिया-मोहरा मार्ग जाना खतरों से खेलना था। मात्र एक-दो मोटर साईकिल कभी-कभार दिख जाते थे परन्तु उनके मन में डर बनाा रहता था।

इस स्थान पर धर्म प्रेमी ‘‘साॅखला बन्धुओं’’द्वारा निर्मित साॅखला प्याउ नाम से जीर्ण-शीर्ण अवस्था में एक प्याउ थी जो सोमरस ग्रहण करने वालों की विश्राम स्थली बनी हुई थी तथा अवांछनीय सामग्री से अटी पड़ी थी। परन्तु समय परिवर्तनशील होता है, इस सुरमा एवं देव भूमि से उन प्रेत एवम् आसुरी शक्तियों का समय पूरा होना था तथा जनमानस एवम् धर्ममय वातावरण बनने का समय आ गया था, जो श्री बालाजी महाराज की कृपा से इतना दुरन्तगति से हुआ कि यही कार्य करने  में शायद वर्षो लग जाते।

GurudevShreeRamphalDasJiMaharajDSC_0111देवयोग से राजराजेश्वर, परमतपस्वी, तत्वज्ञानी वचन सिद्व, प्रातः स्मर्णीय, देवपुरूष, ब्रह्मज्ञानी लोक कल्याणार्थ जीवन आहूत करने वाले हिमालय वासी योगीराज परमपूज्य गुरूदेव श्री श्री 1008 श्री रामफल दास जी महाराज उर्फ ‘‘बाबा बर्फानी’’ के परमशिष्य परमतपस्वी, सरलमना मृदुभाषी, गुरूभक्त आयुर्वेदाचार्य संत श्री सुरेन्द्रदास जी महाराज के पावन चरणों के स्पर्श मात्र एवं आपके कठोर तपबल एवं कठिन पुरूषार्थ से ‘‘ श्री सीताराम सेवा आश्रम ’’ की स्थापना की गई । आप श्री  के भागीरथ  प्रयत्न गुरू भक्तों की असीम आस्था एवं उनकी तन, मन, एवं धन से सेवा व अनवरत् प्रयास से आश्रम का विकास दिन दूनी रात चौगुनी आशाओं के साथ प्रगति की ओर अग्रसर हो रहा है।

क्यों न हो, भौगोलिक दृष्ठि से इस स्थान की दशों-दिशाओं मे देव ही देव विराजते है तथा एक से एक चर्चित देवालय, आश्रम, श्री माताजी के बढ़ेर, मन्दिर, धुणिया व दरगाहे स्थित हो। जिनमें मुख्य रूप से बिलाड़ा – आदि शक्ति पीठ आईमाता जी की बढ़ेर, राजा हर्ष द्वारा निर्मित हर्षादेवल, भगवान आशुतोष का मन्दिर, पाप विमोचनी मां बाण गंगा, राजा बलि की कर्म भूमि तथा अनादि काल से उपस्थित कल्प वृक्ष, ग्राम देवरिया – स्वंय सिद्व केशरिया कंवर जी मन्दिर, ग्राम पाटवा – श्री  भैरू महाराज का मन्दिर, चण्डावल – परमपूज्य वासुदेव जी महाराज का श्री नाथ निंरजन कुटीर एवं समाधि स्थल, श्री  थाणेश्वर महादेव मन्दिर तथा संत श्री घीसाराम जी  का आश्रम, करमावास – पट्टा पुजनीय मोडा भारती जी की धुणी, पिपलिया कलां – श्री संतोष नाथ जी की धूणी, रायपुर –  श्री गणेश पीठ, मनोकामना सिद्व बालाजी आश्रम, देवनारायण मन्दिर, झूंठा –  सुफी संत हुसैन पीर की दरगाह, बर –  रामनन्दी संत श्री कालुराम जी महाराज की धुणी, बिराटिया –  श्री बाबारामदेव जी महाराज का मन्दिर, आकेली –  श्री नागजी का स्वंय सिद्व देवालय ।

भौगोलिक दृष्टि से श्री ईच्छाधारी बालाजी मन्दिर (श्री सीताराम सेवा आश्रम  मोहरा कलां) उक्त सभी स्वंय सिद्व देव स्थानो के बीच सुशोभित हो रहा है जो कि निष्ठावान दानवीर भामाशाह, धर्मप्रेमी दानदाता श्रद्वालुओं को धर्म के प्रति अटूट आस्थाओं का प्रतीक है।

श्री ईच्छाधारी बालाजी मन्दिर (श्री सीताराम सेवा आश्रम  मोहरा कलां) जो श्री बालाजी की स्थापना से पहले एक सुनसान जगह थी उसके प्रांगण में वर्तमान में सम्पूर्ण आश्रम के चार दीवारी, सिंहद्वार, प्याऊ, श्री बालाजी का मन्दिर, योगेश्वर भोलेनाथ का मन्दिर, दक्षिणी द्वार, महाराज श्री की कुटिया, आंगुतक परमआदरणीय संतो के ठहरने का स्थान, गो सेवा स्थान मूक प्राणियो के लिए चुगा पानी की व्यवस्था, यज्ञशाला, कल्पवृक्ष के नर – नारी स्वरूप व भोलेनाथ प्रिय बिलपत्र वृक्ष, स्वेत आक, लाल धतुरा, विभिन्न धार्मिक आयोजन हेतू विशाल प्रांगण, जल, बिजली व्यवस्था आदि से  सुशोभित है। तथा अन्य कार्य भी प्रगति पर है।

उक्त सभी कार्य भक्त शिरोमणि तपस्वी संत श्री सुरेन्द्रदास जी की पावन निश्रा में क्षैंत्र प्रवासी धर्मप्रेमी, भामाशाह, दानवीर के साभार से एवं महाराज श्री के अथक प्रयत्नों द्वारा साकार हो रह हैं।

हम सभी पाठकगणों से सआदर प्रार्थना हैं कि एक बार अवश्य पर आप श्री बालाजी महाराज एवं महाराज श्री के दर्शन लाभ ले – आपके सभी मनोरथ  सिद्व हो की कामना करते है जो कि इस स्थान की विशेषता है ईश्वर आपकी भी मनो कामना सिद्व करें।