ज्ञान की बातें

भारतीय संस्कृति में हमारे ऋषि-मुनियों एवम् पूर्वजों नें आनन्दमय जीवन व्यतीत करने के लिए कुछ नित्यकर्म व धार्मिक धारणाऐं स्थापित की है जिन्हें हम हमारा परम कत्र्तव्य समझ पालन करें तो अवश्य ही ये कर्म हमें हमारे जीवन में खुशी के चार चांद लगाएंगे तथा जीवन शान्तीमय व्यतीत होगा।

-: श्री गणेश पूजन सभी पूजन के पहले क्यों की जाती हैं :-

माँ पार्वती एवम् विश्वकल्याण कर्ता शिव द्वारा प्रथमदेव वरदान प्राप्तकर्ता श्री गणेश का पूजन किसी भी कार्य को करने के पहले किया जाता है ताकि वह कार्य सुख समृद्वि प्रदान करे तथा निर्विघ्न पूर्ण हो।

श्वेत कमल विराजनी, वीणा-वादिनी, बुद्विदात्री माँ सरस्वती की पूजा निर्मल बुद्वि प्रदान करने के लिए की जाती हैं।

श्री स्वरुपा लक्ष्मी अपने अष्ट रुपों धन ,धान्य, धैर्य ,विधा, जय, बीज, जग, और सौभाग्य रुपों में प्रकट हो मानव जीवन में सुख-समृद्वि प्रदान करती हैै। इस हेतु ही श्री लक्ष्मी का लाभ-शुभ साक्षी मानकर दीपोत्सव पर पूजा की जाती हैं।

ब्रह्मस्वरुप, भवतारणहार , भौतिक-दैहिक कष्ट निवारण कत्र्ता , संसार सागर के कष्टों का निवारण कत्र्ता एवम् मोक्ष मार्ग दृष्टा के रुप में भवसागर पार उतरने के लिए की जाती है।

शास्त्र मतों के अनुसार भगवान की पूजा बिना तुलसी दल के अधूरी समझी जाती है इसे विष्णुप्रिया कहा गया है। उसी प्रकार मानव जीवन में माँ तुलसी जगत तारिणी के रुप में घर-घर में पूजी जाती है। इसके स्पर्श , आचमन एवम् सुगन्ध मात्र से मौत केे मुँह में घसीटने वाली व्याधियाँ दूर होती हैै। वास्तु दोषों में भी यह संजीवनी का कार्य करती है अतः हमारे घरों में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए।

पूजा थाली में जितनी भी सामग्री होती है उसका धर्म व वैज्ञानिक दृष्टि से प्रत्येक का अपना महत्व होता है। उनकी उपस्थिति देवपूजन करना , मानव को परमात्मा के साक्षात् दर्शन करवाना तथा सद्गुणों की ओर प्रेरित करना है। जिससे मानव जीवन व्यवस्थित रुप से गुजर सके।

अज्ञानता रूपि अन्धकार को दुर करने तथा जीवन को ज्ञान से प्रकाशमय बनाने का प्रतीक दीपक होता है। प्रभुसेवा, महापुरूषो के पदार्पण, शुभ दिन, आरती में दीपक की उपस्थिति इसी का प्रतीक है तथा वन्दन करते है कि परमात्मा हमारा जीवन विवेकमय हो।

किसी भी अनुष्ठान में देव स्तुति, प्रार्थना करने का प्रथम अक्षर ’’ऊँ’’, ’’त्री देव’’,’’त्री वेद’’,’’त्री लोक’’ का प्रतीक माना जाता है। मात्र ओंकार नाम का विधिवत बैठकर जप किया जाय तो काया के पाँचों कषायों से छुटकारा मिलता है, जानी अनजानी कई शारीरिक व्याधियां भी दुर होती है। यह महापुरूषों का अनुभव है।

कुशलता एवम् गोधन रक्षा के लिए गोवर्धन पूजा कुशलक्षेम एवम् समृद्धि का सूचक है। इसकी पूजा सामग्री की प्रत्येक वस्तु अपने आप में सभी समृद्धि सिद्ध होने की बात संजोए रहती है।

मन्दिर में प्रवेश होने पर सर्वप्रथम घण्टी पर आघात कर ऊँ नाम की ध्वनि उत्पन्न कर वातावरण में उत्पन्न तरगों को स्वर्ण अंगो द्धारा स्वीकार कर परमात्मा से जोड़ना है। ईश दर्शन के पहले इसे बजाकर प्राणी अपने आप को बाहरी वातावरण से मुक्ति पाकर परमात्मा के ध्यान में लीन हो जाता है।

स्वस्थ सोच, स्वस्थ शरीर एवम् स्वच्छ विचार प्राप्ति के लिए उपवास नितान्त आवश्यक है। उपवास हमें अपने आप से जोड़ता है खुद को पहचान करने में योगदान देता है। अतः जब मानव अपने आप के पहचान ले तब स्वतः ही उसकी आत्मा के तार परमात्मा से जुड़ जाते है। मन की समस्त मलीनता दूर हो जाती है और शरीर पावन कमल की तरह खिलकर नई उर्जा प्राप्त करता है।

माता-पिता, आचार्य, देवस्थान, यज्ञ कुण्ड आदि की प्रदक्षिणा करना, सदाचार का शुद्ध जीवन बिताना, वासनाओं पर विजय पाना माना जाता है। प्रदक्षिणा सदैव देवोभव आत्माओं व देवों के उपस्थिति में सदैव उन्हें दाहिने हाथ की तरफ रखकर की जाती है।

व्यावहारिक जीवन में नमस्कार करना विनम्रता का द्योतक है। संसार में जो कार्य विनम्रता से हो सकते है वे किसी और कृत्य से नहीं हो सकते। अपने पूजनीय जनों के चरण स्पर्श करना नम्रता का ही प्रतीक है। स्पर्श हमें अतिरिक्त उर्जा देता है। धार्मिक एवम् वैज्ञानिक दृष्टि से पैर छूना खासकर पैरों के अंगुष्ठ उन पूजनीय आत्माओं के तप बल, गुण धर्म, शुभ कर्मो का अंश दान हमें बिना प्रयत्न किए ही मिल जाता है, जो हमारे शरीर में परोक्ष रूप में प्रवेश कर जाते है, तथा सदा के लिए मानव के एक सुसभ्य बनने में सहायक होते है।

संसार के समस्त सुखों की प्राप्ती ही श्री माता-पिता के चरणांे एवम् आर्शिवचन मंे होती है । इन्हीं की सेवा मंे स्वर्ग एवम् मोक्ष निवास करते है अतः हमारा परम कर्तव्य बनता है कि सदैव उन्हें आदर सत्कार दे तथा उनकी अनुज्ञा का पालन करे इसी मंे ही स्वर्ग है।

मार्ग चाहे विरक्त या गृहस्थ अपनाना हो तो प्रातः शीघ्र उठना, ईश प्रार्थना करना, अपने माता पिता के चरण स्पर्श कर दैनिक नित्य कार्य आरम्भ करना यह स्वयं सिद्व कार्य पुर्ण होने का सन्देश है इसमें कोई सन्देह नहीं। अतः जीवन को सार्थक, प्रगतिशील, शुभ चिन्तनशील, उर्जावान, चहँुमुखी विकास के पथ पर अग्रसर देखना चाहने वालो को प्रातः शीघ्र शैय्या त्याग देनी चाहिए ।

स्वर ही ईश्वर है, शंख से निकला बह्मनाद ओउ्म की ध्वनि त्रिदेव की अपस्थिति को दर्शाता है। इसकी कम्पन्न की ध्वनि समस्त बाहरी वातावरण की ध्वनियों को कमजोर कर देती है एवम् वातावरण में केवल ओंकार ही सुनाई देता है जो मानव मस्त्ष्कि में स्वतः ही परमात्मा के प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न कर देता है।

माला सदैव शान्त स्थान पर एवम् एकान्त भाव से फिरानी चाहिए माला सदा गोमुख के आवरण में रहनी चाहिए ।माला फिराने का उद्देश्य मन मंे धारण करना चाहिए एवम् माला फेरते समय मेरू का उलंघन नहीं करना चाहिए।

अंगुष्ठ से फिराने से ः- मोक्ष प्राप्ति के लिए
2 तर्जनी से फिराने से ः- मुक्ति सुख व शत्रु निग्रह के लिए
3 मध्यमा से फिराने से ः- धनार्थ व सुख प्राप्ति के लिए
4 अनामिका से फिराने से:- सुख शान्ति व गृह शान्ति के लिए
5 कनिष्ठा से फिराने से ः- आकर्षण व शत्रु वश का फल प्राप्त होता है ऐसा महापुरूषों का कथन है।