श्री सुरेंद्र दास जी महाराज

देव  ऋषि, परम तपस्वी  संत श्री 1008 श्री  सुरेन्द्रदास जी महाराज

DSC_8180परमश्रद्वेय संत तपस्वी श्री श्री 1008 श्री सुरेन्द्रदास जी महाराज का जन्म पश्चिम बंगाल के कोलकाता (जो कि स्वामी विवेकानंद जी का जनम स्थल भी हैं) के प्रान्त चौबीस परगना जिले के यादवपुर में दिनांक 25 मई 1960 वैशाख सुदी सप्तमी की शुभवेला में एक सुस्कृंत शुक्ल ब्रह्मण परिवार में हुआ था ।

आपश्री का परिवार सदैव भक्तिभाव, साधु सेवा कथा प्रवचन होम यज्ञ आरती पूजन के पूनीत कार्यो में रतःरहता था। अतः परिवार का वातावरण सदैव धर्ममय रहता था। जहां आपश्री का लालन पालन हुआ था। आपके सरलमना माता-पिताजी के धर्म गुरू श्री लालदास जी महाराज जो कि हरिद्वार में विराजते है अक्सर आपके यहां पधारा करते थे। घर में सदैव   धार्मिक चर्चाएं हुआ करती थी। जिन्हे आप श्री बड़ी तनमयता के साथ सुना करते थे। कभी कभार मन में छोटी मोटी शंकाओं का समाधान कर लिया करते थें।

बाल्यकाल की मात्र 10-12 वर्ष की अल्पायु में धर्म के प्रति आपका बढ़ता रूझान एवं जिज्ञाासा देखकर अक्सर आपकी दादीश्री कहा करती थी, यह बालक बड़ा होकर अवश्य ही बड़ा संत ही बनेगा।

जब कभी भी आपके माता-पिता गुरूदशानार्थ हरिद्वार पधारते, साथ में आप अवश्य पधारते थे। एवं श्री लालदास जी महाराज के प्रवचन सुनते थे।  शनैःशनै उनको कोमल बाल ह्यदय में परिवर्तन होने लगा तथा वैराग्य भाव के प्रति रूचि बढ़ने लगी।  वापिस घर पधारते, परन्तु आपका मन अशान्त रहता सदा मन में संसार का त्यागने एवं प्रभुशरण में जाने का मन रहता था।

कहते है किसी कार्य को करने का संकल्प  हृदय से लेते है तो उनको पराशक्ति भी मदद  करती है। तथा लक्ष्य कदम चूमते है। प्रभु शरण जाने तथा लोग कल्याण का भाव आपके ह्यदय मे इतना घर कर गया कि एक दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठकर श्री प्रभुस्मरण कर अपनी मातृभूमि एवं मन में ही माता-पिता को प्रणाम कर किसी को कुछ भी बताए बिना हरिद्वार के लिए प्रस्थान कर गए। मन में शंका थी की कही घरवाले चिंतित हो हरिद्वार उन्हे ढूंढने के लिए न आ जाएं ऐसा हुआ भी परन्तु उससे पहले आपका उतरकाशी पधारना हो गया। उतरकाशी की देव भूमि पहुंचने आप बढ़ौली नामक स्थान को लोगकल्याणार्थ कार्य करने हेतू अपनी तपस्थली चुना। सदैव ईश्वर भक्ति एवं संत सेवा में लीन रहना आपकी  दिनचर्या बन गई थी। वहा सौभाग्य से एवं प्रभु कृपा से परम पूज्य गुरूदेव श्री 1008 श्री रामफलदास जी महाराज उर्फ ‘‘बर्फानी बाबा’’ का सान्निध्य प्राप्त हुआ आप  श्री से ही महाराज श्री ने दीक्षा एवं गुरूमंत्र  लिया।

तत्पश्चात श्री गुरूआदेशानुसार मां  गंगौत्री से 9 किलोमीटर ओर ऊंचाई पर ‘‘चिड़ावासा’’ नामक स्थान पर पहुंचे और अपनी तपस्थली बनाई  जहां अक्सर तापमान शुन्य से कई गुणा नीचे रहता है। वहां आपने कई वर्षो तक कठोर तपस्या की साथ ही साथ विद्वान सिद्व संतो के सान्निध्य में नीति एवं धर्मशास्त्रों का अध्यन तथा प्रकृति की अमूल्य निघि  मानव मात्र को शारिरीक व्याधियों से छुटकारा मिले ऐसी आर्युेवेद उपचार के लिए विभिन्न जड़ी बुटियो  का गहराई से अध्यन किया।

वहां अपनी तपस्या तथा अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात आपने अपना जीवन लोक कल्याण, प्राणी मात्र की सेवा, जीव दया, धर्म जागरण में आहुत कर वहां से गुजरात प्रान्त में सूरत शहर के पास ‘‘गायपगला’’ स्थान को अपनी कर्मस्थली बनाया। दो चार वर्ष वहा रहने के पश्चात आपका राजस्थान के पाली जिले में रायपुर ग्राम में ‘‘श्री मनोकामना सिद्व बालाजी’’ आश्रम में देव ऋषि संत श्री देवकुमार दास जी के सान्निध्य में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जहां आमुमन इस क्षैत्र के धर्म प्रेमियों का रेला लगा रहता है।

सर्व की मनोकामना पूर्ण करने वाले श्री बालाजी महाराज की कृपा से आपके  सरलमना प्रेम भाव मृदूभाषी स्वभाव धर्मघ्यान निरव्यवसनी प्रवृति, मन में हमेशा श्री सीताराम स्मरण, प्राणी मात्र से प्रेम, जन कल्याण, धर्म जागरण  भाव रखने वाले परम तपस्वी को मोहरा कलां के गुरूभक्तों ने मोहरा विराजने का आमंत्रण दिया जिसे आपने सहर्ष स्वीकार कर लिया

मोहरा कलां में विभिन्न स्थान देखे परन्तु आप श्री संतुष्ठ नही हुएं मोहरा से वापिस बांसिया पधारते हुए अचानक आपको उस बियाबान जंगल में नागदेव के दर्शन हुए वहां पुरानी प्याऊं भी बनी थी । महाराज श्री ने तुरन्त गाड़ी रूकवाई और यही भूमि अपनी कर्मस्थली चूनी जहां लोग दिन जाने से कतराते थे न पानी न बिजली। परन्तु जहां प्रभु कृपा हो जाती है  जंगल में मंगल बनते देर नही लगती।

उसी स्थान पर आज श्री सीताराम सेवा आश्रम एवं बालाजी महाराज की असीम कृपा से विशाल दर्शनीय भव्य आश्रम शोभायमान है।